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  1. Manu Duggal
    सितम्बर 13, 2018 @ 9:10 पूर्वाह्न

    कथा और ज़िंदगी का कोई फिक्स्ड फॉर्मेट नहीं होता और न ही कथा कहने का कोई निश्चित नियम तरीका अथवा माप. हाँ कथा कहने लिखने का सलीका होना चाहिए और कहानी में रवानगी रहे. किस्सों की दुनिया थोड़ी अलग ज़रूर रहती है मगर कथा-कहानी से बाहर नहीं. बाकी तो अपनी अपनी अपेक्षाएं और अपने अपने आग्रह पीयूष जी मगर किस्से बढ़िया हैं इस किताब के और कुछ तो लाजवाब ही हैं. यूं पसंद भी अपनी अपनी ही रहती है.

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